गर्मी के मौसम में ठंडक दिलाता है सत्तू!

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दिन की शुरुआत पोषक आहार के साथ हो, तो दिनभर स्फूर्ति, ऊर्जा, व ताजगी बनी रहती है। आहार शरीर को पोषण देने के साथ-साथ स्वस्थ भी रखता है। यही वजह है कि आयुर्वेद की दृष्टि से उपचार में भी आहार का विशेष स्थान है। जीवा आर्युवेद के निदेशक डॉक्टर प्रताप चौहान के टिप्स आपको भीषण गर्मी में भी कूल रखेंगे।

बड़े काम का है सत्तू

गर्मी के मौसम में ठंडक दिलाता है सत्तू!

चना, मक्का, जौ आदि जैसे मोटे और पोषक अनाजों को बालू या रेत में भूनने के बाद पिसे हुए आटे को ही सत्तू कहा जाता है। पारंपरिक रूप से देशभर में गर्मियों का मौसम आते ही सत्तू का इस्तेमाल हल्के और ठंडक पहुंचाने वाले पौष्टक आहार के रूप में किया जाता रहा है। सभी स्थानों पर सत्तू में गेहूं, चना वा जौ का अनुपात लगभग सामान होने के कारण यह शरीर के लिए कार्बोहाइड्रेट्स का बहुत अच्छा स्त्रोत होता है।

प्रकार व गुण

जौ का सत्तू – जौ को धोने और साफ करने के बाद, भूनने व पीसने पर सत्तू तैयार होता है। वो गुणों में रुक्ष, शीतल एंव थोड़ा भारी होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। यह तासीर में ठंडा, अग्नि प्रदीपक, कब्ज नाशक होने के साथ-साथ कफ व पित्त शामक तथा वात वर्धक होता है। सुपाच्य तो है ही, तुरंत शक्ति प्रदान करने वाला, बलवर्धक और कब्ज दूर करने वाला भी होता है। उसमें प्रोटीन्स 11.5 प्रतिशत तथा कार्बोहाइडेªट्स लगभग 70 प्रतिशत होते हैं।

जौ-चने का सत्तू

चने को भूनने के बाद छिलका हटाकर पिसवा लेने पर चैथाई भाग जौ का सत्तू मिलाने से जौ-चने का सत्तू तैयार हो जाता है। इस सत्तू को पानी में घोलकर या घी-शक्कर मिलाकर पीने से गर्मी और बारिश के मौसम में खोई शारीरिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसकी तासीर ठंडी होती है और यह ठंक देने वाला होता है। चना गुणों में लघु, रुक्ष एवं शीतल होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। वो कफ, पित्त, रक्त शामक एवं वात वर्धक होता है।  इसमें लगभग 18 प्रतिशत प्रोटीन तथा 61 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। चने का सत्तू मधुमेह, स्थौल्य एवं रक्त विकार के लिए प्रशस्त होता है। अम्लपित्त तथा परिणाम शूल में चने का सत्तू आहार रुप में देते हैं।

गेहूं का सत्तू – गेहूं स्निग्ध, मधुर, शीतल एवं पचने में भारी होता है। यह वात, पित्त शामक तथा कफ वर्धक होता है। साथ में वो जीवनीय, संधान कारक, स्थैर्य कारक और बृहणीय होता है। गेहूं का सत्तू पचने में गेहूं से हल्का होता है।

जौ-चने और गेहूं का सत्तू- एक किलो चने की दाल, आधा किलो गेहूं और दो सौ ग्राम जौ को एक साथ अधिकतम दस घंटे पानी में भिगो कर छाया में सुखा लें। साफ करने के बाद तीनों को भुनवा कर पीस लेने पर यह सत्तू तैयार होता है। इसमें तीनों मुख्य अनाज होने के कारण शरीर को पूरा पोषण प्राप्त होता है। जौ और चना होने के कारण यह बेहद ऊर्जावर्धक व पचने में आसान भी होता है।

सेवन की विधि       

सत्तू सेवन की निम्न विधियां अधिक लोकप्रिय हैं-

  1. किसी भी प्रकार के सत्तू को ताजे पानी के साथ पतला पेय बना कर पिया जा सकता है। पानी घड़े का हो, तो ज्यादा अच्छा है। स्वाद अनुसार गुड़/चीनी या नमक मिलाया जा सकता है।
  2. लप्सी (गाढ़ा घोल) बनाकर खाना भी कम रुचिकर नहीं होता। पानी की मात्रा कम और सत्तू की मात्रा अधिक रखकर इसे तैयार करने का बाकी तरीका पतला पेय बनाने जैसा ही है।
  3. सत्तू की टिक्की, पूड़ी, रोटी, पराठा आदि भी खाया जा सकता है। नमकीन सत्तू में भुना हुआ जीरा, हींग, अजवाइन जैसे तत्वों को मिला लेना भी इसके पाचक गुणों को बढ़ा देता है।

सेवन संबंधी सावधानी      

  1. खाना खाने के बाद सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिए।
  2. सत्तू पेट भरकर नहीं खाना/पीना चाहिए।
  3. रात के समय सत्तू का सेवन न करें।
  4. सत्तू के साथ पानी की मात्रा ज्यादा नहीं रखनी चाहिए।

आयुर्वेदिक महत्व      

आहार को आयुर्वेद के तीन उपस्तंभों में से एक और प्रमुख कहा गया है। रेशा (फाइबर), कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, स्टार्च तथा खनिजों की प्रचुर मात्रा होने के कारण आयुर्वेद ने सत्तू को सम्यक पूर्ण आहार का दर्जा दिया है। इन्हीं गुणों के कारण सत्तू मोटापा कम करने और डायबटीज जैसे रोगों के नियंत्रण में भी बहुत लाभदायक है।

Source: ibnlive

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