पदमासन से शुद्ध होती हैं नाड़ियां

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बैठकर किए जाने वाले आसनों में पदमासन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इससे योगी लंबे समय तक ध्यानमग्न रह सकता है। पदमासन सिद्ध करने वालों को मानसिक और शारीरिक लाभ दोनों हासिल हो जाते हैं। पाचन शक्ति ठीक होती है और नाड़ियां शुद्ध होती हैं।

ध्यान लगाने के लिए एक घड़ी तक निश्चल बैठना जरूरी होता है। एक अनुमान है कि एक घड़ी 45 मिनट की होती  है। 45 मिनट तक निश्चल बैठना तभी संभव है जब पैरों से लेकर नितंब तक कोई रक्त नलिका में रक्त प्रवाह बाधित न हो। पदमासन  इसके लिए उपयुक्त आसन है।
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कैसे करें
दाहिना पांव बाईं जंघा पर और बायां पांव दाहिनी जंघा पर रखिए। दोनों पांव दोनों जंघाओं पर ठीक प्रकार आ जाएं फिर बाएं घुटने पर बाया और दायां हाथ दाएं घुटने पर रखिए। पीठ, कमर, गला, सिर, पृष्ठवंश सीधा समरेखा में रखिए, चाहे अपनी दृष्टि भूमध्य पर अथवा नासिकाग्र पर रखिए। इस आसन को पदमासन या कमलासन भी कहते हैं।

अर्ध पदमासन
कइयों की जंघाएं इतनी मोटी होती हैं कि उनके दोनों पांव दोनों जंघाओं पर किसी भी तरह नहीं आ पाते हैं। शुरू  में वे इस आसन को नहीं कर सकते। इन्हें शुरू में ‘अर्ध पदमासन’ लगाना चाहिए और फिर पदमासन लगाने का प्रयत्न करना चाहिए।
एक ही पांव दूसरे पांव की जंघा पर रखने से अर्ध पदमासन होता है। पांवों के हेर-फेर से दोनों ओर के आसन इस प्रकार ही बन सकते हैं। पूर्ण पदमासन  से पांवों की नस-नाड़ियां शुद्ध होती हैं, और ध्यानादि के लिए एक ही आसन पर अधिक देर तक बैठना सुगम होता है। पदमासन में बैठकर पेट की पसलियों को ऊपर खींचने से कुछ देर वहां ऊपर ही रखने से पाचन-शक्ति बढ़ जाती है और पेट की आम-वायु दूर होती है।

पदमासन- पर्वतासन

पदमासन  में बैठकर कंठमूल में ठोड़ी लगाने से और पृष्ठवंश सीधा रखने से मस्तिष्क का मज्जा-प्रवाह बढ़ता है, इसी कारण इससे विचार-शक्तिबढ़ती है। कई लोग इस पदमासन को करने के समय हाथ बीच में रख़ते हैं, बहुत से अपने हाथों को ऊपर करके सिर के ऊपर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं, और हाथ वैसे ही वहां रख़ते हैं। इसे ‘पर्वतासन’ कहते हैं। इससे पेट और छाती के स्नायुओं में अच्छी प्रकार ऊपर का खिंचाव आता है, और उक्त स्नायुओं को लाभ पहुंचता है। इसे पर्वतासन इसलिए कहते हैं कि इसकी शक्ल पर्वत जैसी बनती है। दो-चार मिनट इस आसन में बैठ जाने से छाती और पेट के स्नायुओं में अच्छी तरह खिंचाव होता है।

पदमासन-ताड़ासन

कई लोग पदमासन में बैठकर हाथों से ‘ताड़ासन’ करते हैं। हाथ ऊपर, नीचे, बीच में और तिरछा करके सीधा बाहर खींचते हैं। एक ही समय में विभिन्न आसनों के भागों को मिलाने से बड़े लाभ होते हैं। ताड़ासन के हाथों का खिंचाव दोनों का तथा एक-एक का भी हो सकता है।

पदमासन में बैठकर दायां हाथ बाएं घुटने पर रखिए और अपना घड़ बाईं ओर घुमाइए, चाहे बायां हाथ ज़मीन पर सहारे के लिए रखकर अपनी छाती जितनी पीठ की ओर जा सकती है, उतनी घुमाइए। ऐसा करने से कमर और पेट के स्नायुओं पर अच्छी तरह खिंचाव आ जाएगा। छाती जितनी पीछे की ओर जाना संभव है, उतनी जाने के बाद वहां ही ठहर जाइए।

ध्यान रखिए कि पदमासन के पांव जहां थे वहां ही स्थिर रहने चाहिए और कमर के ऊपर का ही भाग घूमाना चाहिए। इसी प्रकार दूसरी ओर भी घुमा सकते हैं। गर्दन भी पीठ की ओर जितनी अधिक घुमाई जा सकती है उतनी अधिक घुमानी चाहिए। पेट को ठीक करने के लिए यह आसन अत्यंत सुगम है और अति लाभदायक है। धड़ घुमाने अर्थात् धड़ का भ्रमण करने के लिए इसे ‘भ्रमरासन’ कहते हैं। इसके करने से पेट के कई दोष दूर होते हैं। यद्यपि यह आसन सुगम है तथापि इसका अत्यंत महत्व है और यह अत्यंत लाभदायक भी है। इस आसन में ठोड़ी कंठमूल में डटकर लगाने से बहुत आरोग्य मिलता है। इससे स्त्री-पुरुष अपना आरोग्य बढ़ा सकते हैं।

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की पुस्तक ‘योग के आसन’ से साभार.

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