घेंघा का इलाज

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यह आम जानकारी की बात है कि हमारे भोजन में कई प्रकार के खनिज एवं तत्त्व जैसे कैल्शियम, लोहा, फॉस्फोरस आदि का होना अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है आयोडीन, जिसकी बहुत ही थोड़ी मात्रा (एक ग्राम का दस हजारवां भाग, सुई की नोक के बराबर) हमें प्रतिदिन मिलती रहनी चाहिए। हमारे शरीर में थायराइड नामक गल-ग्रंथि को थायराइड हारमोन बनाने के लिए आयोडीन की आवश्यकता होती है। थायराइड हारमोन शरीर की उपाच्य क्रिया को नियंत्रित करते हैं। इसी पर हमारा शारीरिक व मानसिक विकास निर्भर करता है। पर्याप्त मात्रा में आयोडीन न मिलने पर शारीरिक व मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता, जिससे कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

आयोडीन की कमी का स्पष्ट परिणाम घेंघा रोग या गलगण्ठ है जिसमें गल-ग्रंथि फूल जाने से गले में सूजन आ जाती है, लेकिन घेंघा रोग आयोडीन की कमी के विकारों से सबसे कम खतरनाक है। यह एक पुराना विश्वव्यापी रोग है। कई देशों ने इस पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया है। हमारे देश के पर्वतीय, तराई एवं पूर्वांचल के क्षेत्र तथा उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र इससे अधिक प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों में आयोडीन की कमी और इस रोग सम्बन्धी पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं न होने के कारण कई परिवारों में यह रोग वंशानुगत बन गया है।

आयोडीन की कमी के कारण बौनापन, गुँगापन, बहरापन, मंदबुद्धि आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। संतुलित विकास के लिए छोटे बच्चों, तरुणों और गर्भवती महिलाओं को आयोडीन की उचित मात्रा मिलना अति आवश्यक है। गर्भवती महिलाओं को अधिक आयोडीन की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था में आयोडीन की कमी होने से मानसिक और शारीरिक रूप से विकृत, गूंगे और बहरे बच्चे पैदा हो सकते हैं। बड़ों में भी आयोडीन की कमी से मंदबुद्धि और सुस्ती के लक्षण पैदा होते हैं। आरंभिक अवस्था में यदि इस पर ध्यान न दिया गया, तो ये स्थायी जानलेवा रोग बन जाते हैं।

घेंघा का कारण और बचाव

साधारणतया आयोडीन की दैनिक आवश्यकता हमारे खाने-पीने की वस्तुओं से पूरी तरह हो जाती है। हमारे भोज्य पदार्थ इस आयोडीन को जमीन से ग्रहण करते हैं। अधिक वर्षा, बाढ़ और भूक्षरण के कारण जमीन में आयोडीन की मात्रा घट जाती है। ऐसी भूमि में उगने वाली फसलों, फल-फूल और साग-सब्जी में आयोडीन की मात्रा कम हो जाती है। समुचित आयोडीन न मिलने के कारण इन स्थानों में अनेक लोग आयोडीन की कमी से होने वाले विकारों के शिकार हो जाते है।

आयोडीन की कमी के विकारों से बचने के लिए भोजन में आयोडीन की उचित मात्रा का समावेश करना अति आवश्यक है।

राष्ट्रीय घेघा नियंत्रण कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाह पर सभी राज्यों में आयोडीन रहित नमक की बिक्री पर प्रतिबंध लगा देने के आदेश दिए गए हैं। आयोडीनयुक्त नमक देखने और खाने में साधारण नमक जैसा ही होता है, परंतु उसमें पोटैशियम आयोडेट के रूप में मिलाई गई थोड़ी-सी आयोडीन हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होती है। यह धारणा कि ज्यादा आयोडीन लेने से हमें किसी प्रकार की हानि हो सकती है, गलत है। हमारा शरीर जरूरत भर की आयोडीन लेकर बाकी को पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देता है।

आयोडीनयुक्त नमक सभी के लिए लाभदायक है। आयोडीनयुक्त नमक को धूप और नमी में खुला न रखें उपयोग में लाने से पहले नमक को धोएं नहीं अधिक धूप, नमी और धोने के कारण नमक से आयोडीन निकल जाएगी। जो नमक आप उपयोग में ले रहे है, उसमें आयोडीन है या नहीं, यह सुनिश्चित कर लें।

घेंघा रोग का होमियोपैथिक दवा

होमियोपैथिक औषधि ‘आयोडियम‘ भी इसमें काफी कारगर रही है। वैसे तो लक्षणों की समानता के आधार पर अन्य औषधियां भी प्रयुक्त की जा सकती है, किंतु आयोडीन की कमी परिलक्षित होने पर ‘आयोडियम‘ औषधि की 2-3 खुराकें 200 शक्ति में देना ही पर्याप्त रहता है।

आंवला खाएं – बुढ़ापा भगाएं

स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए रोज सुबह आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए। जिन स्कूली बच्चों को सबक याद नहीं रहता, बुढ़ापे में जिनकी स्मरण शक्ति कमजोर हो गई हो, उनके लिए आवले के मुरब्बे का सेवन बेहद लाभकारी है। आंवले का मुरब्बा दूध के साथ सेवन करने से हृदय के सभी विकार दूर हो जाते हैं और स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता है। रोज सुबह टहलने या व्यायाम करने के बाद ताजे आवले के 20 मिलिलीटर रस में 10 मिलिलीटर शहद मिलाकर पीएं और दो घंटे तक कुछ भी न लें। इस तरह ताजा आंवले के रस का सेवन तीन महीने तक नित्य करने से कायाकल्प हो जाता है। सदा स्वस्थ और निरोग रहने का यह श्रेष्ठ योग है।

Source: homeopathicmedicine

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